जम्मू कश्मीर में उम्मीदों का नया सूरज?

पत्थरबाज़ी अतीत की बात, वोट के जरिए भविष्य की कहानी — ग्राउंड रिपोर्ट

श्रीनगर और जम्मू से लौटकर

“पहले लड़की उठती थी पत्थरबाज़ी के लिए, लड़का उठता था पत्थरबाज़ी के लिए, अब ये सिस्टम बंद हो गया है।”

अनंतनाग की गज़ाला बट ने एक सांस में यह कहते हुए जम्मू कश्मीर की मौजूदा तस्वीर बयान करने की कोशिश की।

कुछ साल पहले के हालात के साथ तुलना करते हुए उन्होंने बताया,
“पहले हम बात नहीं कर पाते थे कि हमारे साथ कुछ ग़लत हो रहा है। टेटर (आतंक) था कश्मीर में बहुत ज्यादा। हम बाहर निकलते थे तो पथराव होता था।”

गज़ाला से मुलाक़ात श्रीनगर में हुई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद। तारीख थी 19 सितंबर।

हमें श्रीनगर आए 30 घंटे से ज्यादा हो चुका था। 18 सितंबर को जम्मू कश्मीर में पहले चरण की वोटिंग शुरू होने से कुछ ही मिनट पहले हमारा विमान श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरा।

उम्मीदों का नया सूरज?

10 मिनट में सामान लेकर बाहर आए और नज़र आसमान की ओर गई। सूरज देवता झांकना शुरू ही कर रहे थे।

मन में सवाल उठा — क्या यह उम्मीदों का नया सूरज है?

लोकसभा चुनाव में जम्मू कश्मीर के लोगों ने जमकर वोटिंग की थी। घाटी में भी बड़ी संख्या में मतदाता बाहर निकले थे। विधानसभा चुनाव के लिए वही एक पैमाना था।

16 अगस्त से ही दिल्ली समेत पूरे देश में जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव की गूंज सुनाई दे रही थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी ने प्रचार के दौरान अपने काम गिनाते हुए लगातार बताया कि किस तरह “तीन खानदानों” — कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी — ने जम्मू कश्मीर की तरक्की में रोड़े अटकाए।

दूसरी ओर राहुल गांधी जम्मू कश्मीर से “खून के रिश्ते” की बात कर रहे थे। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला अपनी पार्टी की भूमिका गिना रहे थे, जबकि महबूबा मुफ्ती दोनों दलों पर हमलावर थीं।

राजनीति से ज्यादा लोगों का मन समझने की कोशिश

चुनाव के बीच जिन किरदारों की चर्चा थी उनमें सिर्फ पार्टियां ही नहीं थीं।

लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला और सज्जाद लोन को हराने वाले इंजीनियर रशीद और बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों की भी चर्चा थी।

लेकिन हमारी दिलचस्पी राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा लोगों के मन का माहौल समझने में थी।

आर्टिकल 370 हटने और जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है।

इस चुनाव में कई नए रिकॉर्ड भी बने।
मसलन, सिर्फ तीन चरणों में चुनाव होना और किसी तरह के बंद या बायकॉट का कॉल नहीं आना।

श्रीनगर में उदासीनता की झलक

श्रीनगर एयरपोर्ट बड़गाम जिले में है और डल झील के करीब हमारा होटल वहां से लगभग 15 किलोमीटर दूर था।

टैक्सी ड्राइवर रईस (बदला हुआ नाम) पहले शख्स थे जिनसे चुनावी माहौल के बारे में सवाल किया।

उन्होंने बेरुखी से जवाब दिया,
“हम तो वोट नहीं देते।”

वजह पूछने पर बोले,
“साहब आप दिल्ली से आए हो। सोचो, आज वहां चुनाव होता तो काम करने यहां आते या वोट देते?”

उन्होंने आगे कहा,
“हम चाहते हैं कि 10 और साल चुनाव न हों। जो सरकार चल रही है अच्छी है।”

यह बात हैरान करने वाली थी। लोकतंत्र में कोई चुनाव क्यों नहीं चाहेगा?

कैमरे पर बोलने से हिचक

श्रीनगर में होटल के आसपास कुछ और लोगों से बातचीत हुई, लेकिन कैमरे पर बोलने के लिए कोई तैयार नहीं था।

डल झील के पास शिकारा चलाने वाले गनी ने साफ कहा,
“हम मीडिया से बात नहीं करते।”

एक रेस्तरां के मालिक ने मुस्कुराते हुए कहा,
“यह हमारा फंडामेंटल राइट है।”

मतदान प्रतिशत ने दी अलग तस्वीर

दिन चढ़ने लगा और मतदान प्रतिशत से जुड़ी रिपोर्टें आने लगीं।

पहले दो घंटों में ही पहले चरण की 24 सीटों पर 11 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग हो चुकी थी।

पहले चरण में 61 प्रतिशत से ज्यादा और दूसरे चरण में 56 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ।

हालांकि श्रीनगर में मतदान अपेक्षाकृत कम रहा और आंकड़ा 30 प्रतिशत से ऊपर नहीं जा सका।

बदलाव की बात भी सुनाई दी

डल झील के दूसरे किनारे दुकानदार मुख्तार ने कहा,

“जो अच्छा नेता बनेगा, उसी को वोट देंगे।”

उन्होंने माहौल में आए बदलाव की भी बात की।

“कश्मीर बदल गया है। पहले हड़ताल होती थी, अब बेहतर है।”

लाल चौक से शंकराचार्य तक बदला माहौल

लाल चौक पर इंदौर से आए दीपक अपने परिवार के साथ तिरंगे से रोशन घंटाघर के सामने तस्वीरें खिंचवा रहे थे।

जब उनसे पूछा गया कि क्या यहां डर लगता है, तो उनका जवाब था —

“डर कैसा?”

शंकराचार्य मंदिर पहुंचे 78 वर्षीय अनूप राम दीक्षित ने बताया कि वह तीसरी बार जम्मू कश्मीर आए हैं, लेकिन पिछली दो बार वह जम्मू से आगे नहीं जा सके थे।

मुंबई से आए नरेंद्र ने कहा,

“बहुत मस्त माहौल है। कोई भय नहीं, कोई टेंशन नहीं, सब तरफ शांति है।”

पर्यटन और कारोबार में तेजी

आंकड़े बताते हैं कि साल 2023 में दो करोड़ 11 लाख से ज्यादा पर्यटक जम्मू कश्मीर आए।

2020 में यह संख्या करीब 34 लाख थी।

श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर केसर कारोबारी आशिक बताते हैं,

“2006 तक यहां हमारी अकेली दुकान थी। अब लाइन लग गई है।”

क्रिकेट बैट बनाने वाले कारोबारी शाम लाल ने बताया,

“कश्मीरी विलो से बने बैट की मांग देश के साथ विदेश में भी है। कल ही दो बैट इंग्लैंड भेजे हैं।”

समस्याएं अभी भी मौजूद

हालांकि सब कुछ आदर्श नहीं है।

कुपवाड़ा के इरफान कहते हैं,

“कश्मीर में बदलाव तो आया है, लेकिन बेरोजगारी की समस्या अभी भी बड़ी है।”

टैक्सी ड्राइवर अमजद अली की शिकायत है कि 370 हटने के बाद परमिट महंगे हो गए हैं और जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर टोल भी बढ़ता जा रहा है।

जम्मू की अलग राजनीतिक भावना

घाटी के मुकाबले जम्मू में लोग ज्यादा खुलकर बात करते हैं।

यहां कई लोग आर्टिकल 370 की वापसी के पक्ष में नहीं दिखते।

बलजीत शर्मा कहते हैं,

“यह काला धब्बा था जो हट गया। वन कंस्टीट्यूशन, वन फ्लैग — यही सही है।”

लेकिन कुछ लोग भेदभाव की शिकायत भी करते हैं।

सुमित छाबड़ा कहते हैं,

“हर नेता श्रीनगर या कश्मीर की तरफ ज्यादा ध्यान देता है। सरकार बनने के बाद सारा ध्यान वहीं चला जाता है। जम्मू की तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”